मंगलवार, 23 जून 2015


यदि आप ये ना होते तो क्या होते?



चलिये आज कुछ बात करते है, आपके अपने प्रॉफ़ेशन की। यदि आप अपने इस कैरियर में न होते तो क्या होते? वैसे तो मैंने पहले भी इस बारे में बात लिखी है, पिछली बाते ताज़ा करने के लिए ये वाला लेख देखिये। तो जनाब शुरू करते है। यदि मैं अपने इस बैंक वाले पेशे में न होता तो
खेती   : चूंकि मेरे पिता एक किसान थे इसलिए यह पेशा तो मेरे लिए आरक्षित ही था।हांलाकि मेरे घर वालों की बिल्कुल इच्छा नही थी कि मैं इस पेशे में आऊ।मेरी मां हांलाकि पढी लिखी नहीं थी पर उनकी सोच अपने समय से आगे थी।मुझे याद है जव मेरे बडे़ भाई इंगलैड गए थे मां ने उस उम्र में पढना सीखा ताकि भाई को पञ लिख सके।पढना सीखने के बाद मां भाई को लम्बा पञ लिखती थी जो हफ्ते दस दिन में पूरा होता था मां की इच्छा होती थी कि मैं डाक्टर बनू पर मेरा मन तो साहित्य में लगता था साइंस तो जबरन पढते थे।बचपन में घर में रामायण रहता था उसका लंका कान्ड मुझे बहुत अच्छा लगता था।वह रूचि आज भी बनी है।गावं में एक व्यक्ति थे उनके पास पुस्तकों की लाइव्रेरी थी गर्मी की दुपहरिया चन्द्रकान्ता संतति के नौ भाग पढने में बीत जाती थी तो हमें नीरस विज्ञान में रुचि कैसे आती।
गायक : मेरे को गायकी का कीड़ा बहुत पहले ही काट चुका था, माशा-अल्ला उस समय आवाज़ भी काफी अच्छी थी, शहर में एक बार रोटरी क्लब वालों ने एक प्रतियोगिता आयोजित कारवाई थी,  बड़े जतन और लगन से उसमे भाग लिया था।  उस समय संगीत और सुरों का कोई विधिवत ज्ञान न होते हुए भी, मेरे को एक (सांत्वना) पुरस्कार मिला था। फिर प्यार-श्यार के चक्कर में बंदा गायक बन ही जाता है, नहीं नहीं, में अता-तुल्लाखान तो नहीं बना, लेकिन दर्द भरे नगमे गाने में मेरी महारत थी। कई बार सोचा कि संगीत की विधिवत शिक्षा लूँ, लेकिन रोजी रोटी के चक्कर में सब धरा का धरा रह गया।  लेकिन समय रहते रहते गायकी का भूत भी उतार गया, या कहो घर वालों ने उतार दिया। इस तरह से एक अच्छे खासे उभरते गायक की प्रतिभा को दबा दिया गया। अभी भी कभी कभी गुनगुना लेता हूँ,।
संगीतकार:: संगीत का शौक मुझे बचपन में कव जागा मुझे पता नहीं।बचपन में गांव में भिक्षा मांगने साधु लोग आते थे वह कुछ वाद्य बजा कर गाते थे मै उनसे उनका बाद्ययंञ लेकर बजाने की कोशिश करता था।पर पढाई एवं अन्य कारणों से कुछ हो न पाया।एक बार बनारस में मौका मिला पत्नी गांव एक माह के लिए गई थीं मैने एक सगींत विद्यालय में प्रवेश लिया एवंआफिस से छुट्टीं होने पर बैंजो सीखने लगा पर  पता नहीं क्या हुआ श्रीामती पहले ही वापस आ गई मेरा सगींतकार बनने का प्रयास धराशायी हो गया।


ट्रैवल ब्लॉगर : मेरे को घूमने का बहुत शौंक है। भारत के लगभग हर हिस्से को कई कई बार देखा है। इतनी यात्राएं की है, मेरी हसरत थी कि, मै एक दो डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाऊँ, लेकिन क्या करें, कोई विडियो शूट करने वाला पार्टनर नहीं मिला, चाहे कुछ भी हो, कभी न कभी मै एक विडियो डॉक्युमेंट्री जरूर बनाऊँगा। देखते है ये हसरत कब पूरी होती है।
उपन्यासकार :  बचपन में जासूसी नॉवेल बहुत पढे थे, राजन-इकबाल, राम-रहीम से बढ़ते हुए, विक्रांत, विजय-विकास और केशव पंडित तक को पढ़ा। मेरे पसंदीदा उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा थे, । बचपन में काफी आधी अधूरी कहानिया लिखी थी, जिनमे मौलिक कम कॉपी ज्यादा थी। लिखने का शौंक तो था, लेकिन उपन्यास लिखने का साहस कभी नहीं जुटा सका। इसलिए समय रहते ये शौंक भी जाता रहा।
शतरंज के खिलाड़ी :  मेरा एक और शौंक था, शतरंज खेलना। बचपन में, मैंने स्कूल/कॉलेजस्तर पर खेला था, लेकिन उसके बाद कभी भी इसको पेशे के तौर पर नहीं अपना पाया। समय  रहते बाकी के सारे शौंक तो खतम हो गए, लेकिन ये शौंक अभी भी बरकरार  है।
धर्मगुरु : आप कहेंगे का भी कोई प्रॉफ़ेशन होता है, हाँ जी होता है, ये पेशा ही सबसे अच्छा पेशा है। भले ही हमारे 36 करोड़ देवी देवता है, उसके बाद भी हमारे यहाँ लाखो धर्म गुरुओं का बिज़नस बे रोक टोक, शान से चल रहा है। बस आपको लोगों को प्रभावित करने आना चाहिए, गूढ गूढ बाते करिए, बाकी चेले चपाटी, संभाल लेंगे। बाकी गुण तो मेरे में है, लेकिन कभी भी इस बारे में गंभीरता से नहीं सोचा, सोचता हूँ अब बुढ़ापे में इस बारे में भी सोचा जाये, हो सकता है काम बन जाये। आप क्या कहते हो?
चलिये मैंने तो अपनी बता दी, आप भी कुछ अपने बारे में लिख डालिए। मेरे बचपन के और ढेर सारे खुराफाती शौंक के बारे में जानने लिए यहाँ देखें। तो फिर आते रहिए और पढ़ते रहिए|

 आइए एक जानदार गीत सुनते है।

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